पोलो देखन चला बिस्टान | निमाड़ी पोला गीत | किसान लोकपर्व

🐂 पोलो देखन चला बिस्टान
निमाड़ी पोला गीत | किसान और पशु-प्रेम का प्राचीन पर्व
🎵 About Song – पोलो देखन चला बिस्टान
Title: पोलो देखन चला बिस्टान
Genre: निमाड़ी लोकगीत / किसान लोकपर्व गीत
Theme: पोला पर्व, किसान संस्कृति, ग्रामीण जीवन
Language: निमाड़ी
Region: निमाड़ अंचल (मध्यप्रदेश) Singer: गितेश कुमार भार्गव
Lyricist (Lyrics): राजेश भाई रेवेलिया
✨ भूमिका (Introduction)
पोला मध्यप्रदेश के खरगोन–निमाड़ अंचल और महाराष्ट्र के किसानों द्वारा मनाया जाने वाला एक प्राचीन कृषि एवं पशु-प्रेम से जुड़ा लोकपर्व है।
यह पर्व विशेष रूप से बैल, कृषि संस्कृति और ग्रामीण जीवन के उत्सव का प्रतीक है।
प्रस्तुत गीत “पोलो देखन चला बिस्टान” पोला पर्व की खुशियाँ, जुलूस, साज-सज्जा और सामूहिक उल्लास को निमाड़ी लोकधुन में जीवंत करता है।
✨ Song Description
“पोलो देखन चला बिस्टान” एक पारंपरिक भावों से सजा हुआ निमाड़ी लोकगीत है, जो किसानों के लोकपर्व “पोला” की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है। यह गीत ग्रामीण जीवन की उस खुशी, उमंग और परंपरा को दर्शाता है, जब किसान अपने बैलों को सजा-धजा कर पोला पर्व पर उनकी पूजा करता है और पूरे गांव में उत्सव का माहौल बन जाता है।
इस गीत को गितेश कुमार भार्गव ने अपनी सशक्त और भावनात्मक आवाज़ में गाया है, जिससे खेत-खलिहान, बैल, किसान और गांव की खुशियाँ श्रोताओं के मन में सजीव हो उठती हैं। राजेश भाई रेवेलिया द्वारा लिखे गए बोल निमाड़ी लोकभाषा की मिठास और ग्रामीण संस्कृति की आत्मा को बखूबी समेटे हुए हैं।
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📜 मूल गीत
🎵 मुखड़ा
गोरी ओ करि ली जो श्रृंगार,
पोलो देखन चला बिस्टान।
बाळ गोपाळा क लय न चलांगा हो – 2
लय न चला मोटर कार॥
🎶 अंतरा – 1
धोती कमीज पेरी, माथा प पागड़ी,
नाचा झमाझम, घरी न लाखडी।
नथ बेसर अरु पेरी न झूमको,
डी.जे. और ताशा लगी रयो ठुमको।
धूम मचग पोळा का दिन हो – 2
बिस्टान का बीच बाजार।
गोरी ओ करि ली जो श्रृंगार,
पोलो देखन चला बिस्टान॥
🎶 अंतरा – 2
की किसान भाई सब बैल्या सिंगार,
जुलूस निकाव्व बड़ी धुआधार।
निक खेल तमासी बड़ी मजदार,
सजी-धजी ने आव नर-नार।
हो बैल्या की जोड़ी न तोरण क तोड़ी,
आई खुशी की बहार।
गोरी ओ करि ली जो श्रृंगार,
पोलो देखन चला बिस्टान॥
🎶 अंतरा – 3
नवळ्य सुकळ्य को पाटील समाज,
प्राचीन समय सी चल्यो रिवाज।
बयल्या जोड़ी के गहना सजावा,
रंग-बिरंगी कपड़ा पेहरावा।
खुशियाँ मनावा, मंगल गावा,
हो करि न मंगलाचार।
गोरी ओ करि ली जो श्रृंगार,
पोलो देखन चला बिस्टान॥
🎶 अंतरा – 4
कुनूबी पाटील न की फेमस त्योहार,
बेइण न लाव राखी को तार।
नारायण की पूजा करा सब,
भादव की आई फुवार।
गोरी ओ करि ली जो श्रृंगार,
पोलो देखन चला बिस्टान॥
Gori o kari li jo shringaar,
Polo dekhan chala Bistaan.
Baal Gopaala ka lay na chalaanga ho – 2
Lay na chala motor car.
🎶 Antara – 1
Dhoti kameej peri, maatha pa pagdi,
Naacha jhamajham, ghari na laakhdi.
Nath besar aru peri na jhoomko,
DJ aur taasha lagi rayo thumko.
Dhoom machag Pola ka din ho – 2
Bistaan ka beech bazaar.
Gori o kari li jo shringaar,
Polo dekhan chala Bistaan.
🎶 Antara – 2
Ki kisaan bhai sab bailyan singaar,
Juloos nikaavv badi dhuaadhaar.
Nik khel tamaasi badi mazdaar,
Saji-dhaji ne aav nar-naar.
Ho bailyan ki jodi na toran ka todi,
Aayi khushi ki bahaar.
Gori o kari li jo shringaar,
Polo dekhan chala Bistaan.
🎶 Antara – 3
Navlya suklya ko Paatil samaaj,
Praacheen samay si chalyo rivaaj.
Bailya jodi ke gehna sajaava,
Rang-birangi kapda pehraava.
Khushiyaan manaava, mangal gaava,
Ho kari na mangalaachaar.
Gori o kari li jo shringaar,
Polo dekhan chala Bistaan.
🎶 Antara – 4
Kunubi Paatil na ki famous tyohaar,
Bein na laav rakhi ko taar.
Naaraayan ki pooja kara sab,
Bhaadav ki aayi phuaar.
Gori o kari li jo shringaar,
Polo dekhan chala Bistaan.
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पोला त्यौहार गीत
Polo Nimadi Song
किसान लोकगीत पोला
Nimadi Pola Festival Song
खरगोन पोला गीत
बैल पूजा लोकगीत
🌾 गीत का भावार्थ (Short Explanation)
यह गीत पोला पर्व के दिन गांवों में होने वाले बैल सजावट, जुलूस, नृत्य, वाद्ययंत्र और सामूहिक उल्लास का चित्रण करता है।
कवि किसान के जीवन, पशु-प्रेम, सामाजिक एकता और धार्मिक आस्था को निमाड़ी लोकभाषा में सजीव करता है।
🌾 गीत का विस्तृत भावार्थ
निमाड़ी पोला लोकगीत – किसान और पशु-प्रेम का उत्सव
🔶 प्रस्तावना
पोला पर्व निमाड़ (खरगोन, बड़वानी, धार) और महाराष्ट्र के किसान समाज का एक अति प्राचीन लोकपर्व है।
यह पर्व वर्षा ऋतु में फसल बोने के बाद बैल, खेती और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है।
प्रस्तुत गीत “पोलो देखन चला बिस्टान” इसी पर्व की सामूहिक खुशी, सजावट, जुलूस और ग्रामीण उल्लास को सजीव चित्रों में प्रस्तुत करता है।
🎵 मुखड़े का भावार्थ
“गोरी ओ करि ली जो श्रृंगार, पोलो देखन चला बिस्टान”
गीत का मुखड़ा बताता है कि पोला पर्व केवल किसानों का नहीं, बल्कि पूरा गांव एक साथ मनाने वाला उत्सव है।
स्त्रियाँ श्रृंगार कर उत्सव देखने निकलती हैं, बच्चे साथ चलने की जिद करते हैं और लोग सादगी के साथ पैदल या पारंपरिक साधनों से मेले की ओर जाते हैं।
यह पंक्ति ग्रामीण सरलता और सामूहिकता को दर्शाती है।
🎶 अंतरा 1 का भावार्थ
इस अंतरे में ग्रामीण पहनावे और नृत्य-उत्सव का सुंदर चित्र है।
धोती-कमीज, पगड़ी, गहने पहनकर लोग झूमते-नाचते हैं।
डीजे, ताशा, ढोल की धुनों पर बाजार गूंज उठता है।
यह दर्शाता है कि पोला के दिन पूरा बिस्टान (बाजार/गांव) एक उत्सव स्थल में बदल जाता है।
यह उत्सव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति का जीवंत प्रदर्शन है।
🎶 अंतरा 2 का भावार्थ
यह अंतरा किसानों और बैलों के गहरे संबंध को उजागर करता है।
किसान अपने बैलों को सजाकर भव्य जुलूस निकालते हैं।
लोग तमाशे देखते हैं, हँसी-मजाक होता है और स्त्री-पुरुष सभी उल्लास से शामिल होते हैं।
“बयल्या की जोड़ी” किसान के लिए समृद्धि, मेहनत और जीवन-साथी जैसी होती है।
तोरण और सजावट खुशहाली और नई आशाओं का प्रतीक है।
🎶 अंतरा 3 का भावार्थ
इस भाग में पाटील समाज और कुनबी समुदाय की परंपराओं का उल्लेख है।
यह बताया गया है कि पोला कोई नया त्योहार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा है।
बैल-जोड़ी को गहनों और रंगीन कपड़ों से सजाना यह दर्शाता है कि किसान अपने पशुओं को परिवार का सदस्य मानते हैं।
मंगल गीत, पूजा और उल्लास सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं।
🎶 अंतरा 4 का भावार्थ
यह अंतरा पोला पर्व की धार्मिक और मौसमी भावना को दर्शाता है।
नारायण (भगवान विष्णु) की पूजा कर किसान अपने पशुओं और फसलों की मंगलकामना करते हैं।
भादव मास की फुहारें प्रकृति की कृपा और नई फसल की आशा का संकेत हैं।
राखी का तार न लगाने की पंक्ति ग्रामीण मर्यादा और लोकपरंपराओं की ओर संकेत करती है।
🌼 समग्र भावार्थ (निष्कर्ष)
यह गीत—
किसान के परिश्रम और पशु-प्रेम को सम्मान देता है
बैल को केवल पशु नहीं, बल्कि कृषि का आधार मानता है
ग्रामीण समाज की सामूहिकता, सादगी और सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखता है
“पोलो देखन चला बिस्टान” केवल एक गीत नहीं, बल्कि
👉 किसान जीवन की आत्मा,
👉 लोकसंस्कृति का दस्तावेज,
👉 प्रकृति और परिश्रम का उत्सव है।


