सोरठ देस सी आई ओ निमाड़ी गणगौर गीत -Lyrics 1952

“सोरठ देस सी आई ओ”
यह गीत निमाड़ अंचल का एक परंपरागत गंगौर गीत है, जो लोक-स्मृति और स्त्री-सौंदर्य की काव्यात्मक अभिव्यक्ति का अनुपम उदाहरण है। यह गीत विशेष रूप से राणी रनुबाई के रूप, सौंदर्य, तेज और गरिमा का लोक-रूपकों के माध्यम से वर्णन करता है।
इस गीत का भावार्थ एवं सांस्कृतिक व्याख्या गितेश कुमार भार्गव द्वारा निर्मित की गई है, जिसमें निमाड़ी लोकभाषा, प्रकृति और स्त्री-सौंदर्य का गहरा समन्वय दिखाई देता है। गंगौर पर्व के संदर्भ में यह गीत माँ पार्वती / ईसराणी के सौंदर्य-वर्णन, सुहाग, शुभता और मंगल कामना का प्रतीक माना जाता है।
सोरठ देस सी आई ओ

थारो काई-काई रूप बखाणूँ रनुबाई,
सोरठ देस सी आई ओ॥
थारी अंगूठी मूँग की से गढ़ी रनुबाई,
सोरठ देस सो आई ओ॥
थारो सिर सूरज को तेज रनुबाई,
सोरठ देस सो आई ओ॥
थारी नाक सुवा की रेख रनुबाई,
सोरठ देस सो आई ओ॥
थारा डोळा निम्बू की फाँक रनुबाई,
सोरठ देस सो आई ओ॥
थारा दाँत दाड़िम का दाणा रनुबाई,
सोरठ देस सो आई ओ॥
थारा ओठ हिंगोट की रेख रनुबाई,
सोरठ देस सो आई ओ॥
थारा हाथ चम्पा का छोड़ रनुबाई,
सोरठ देस सो आई ओ॥
थारा पाँय केवठ का खंभ रनुबाई,
सोरठ देस सी आई ओ॥
थारो काई-काई रूप बखाणूँ रनुबाई,
सोरठ देस सी आई ओ॥
Saurath Des Si Aai O

Tharo kai kai roop bakhaanu Runubai,
Saurath des si aai o ॥
Thaari angalay moong ki sengalay Runubai,
Saurath des si aai o ।
Tharo sir sooraj ko tej Runubai,
Saurath des si aai o ॥
Thaari naak sua ki rekh Runubai,
Saurath des si aai o ॥
Thaara dola nimbu ki phaak Runubai,
Sorath des so aai o ॥
Thaara daant daadim ka daana Runubai,
Saurath des si aai o ॥
Thaara oth hinguṭh ki rekh Runubai,
Saurath des si aai o ॥
Thaara haath champa ka chhod Runubai,
Sorath des si aai o ॥
Thaara paanv kevṭh ka khamb Runubai,
Saurath des si aai o ॥
Tharo kai kai roop bakhaanu Runubai,
Sorath des si aai o ॥
सोरठ देस सी आई ओ निमाड़ी गणगौर गीत -Lyrics 1952

गीत का भावार्थ
1.
“थारो काई काई रूप बखाणूं रनृवाई,
सोरठ देस सी आई ओ”
भावार्थ:
गायिका कहती है—हे रनुबाई! तुम्हारे रूपों का वर्णन मैं कितनी बार करूँ? तुम तो सोरठ (सौराष्ट्र/सुराष्ट्र) जैसे पवित्र और समृद्ध देश से आई हुई देवी-स्वरूपा हो।
यहाँ “सोरठ देस” दिव्यता, शुद्धता और राजसी गरिमा का प्रतीक है।
2.
“थारी अंगव्ठय मूँग की सेगव्ठई रनुबाई”
भावार्थ:
तुम्हारी अंगुलियाँ मूँग की फली जैसी कोमल, सुघड़ और सुंदर हैं।
यह उपमा स्त्री की नजाकत, सुकुमारता और शालीनता को दर्शाती है।
3.
“थारो सिर सूरज को तेज रनुवाई”
भावार्थ:
तुम्हारे मस्तक पर सूर्य जैसा तेज है।
यह तेज दैवी आभा, आत्मविश्वास और तेजस्विता का प्रतीक है—जिससे अंधकार दूर होता है।
4.
“थारी नाक सुआ की रेख रनृबाई”
भावार्थ:
तुम्हारी नाक तोते की चोंच जैसी सुघड़ और सुडौल है।
लोकगीतों में यह उपमा नारी सौंदर्य का पारंपरिक मानक मानी जाती है।
5.
“थारा डोळा निम्बू की फाक रनृबाई”
भावार्थ:
तुम्हारी आँखें नींबू की फाँक जैसी चमकदार और चंचल हैं।
यह उपमा आँखों की तेजस्विता, सजगता और आकर्षण को प्रकट करती है।
6.
“थारा दात दाड़िम का दाणा रनुवाई”
भावार्थ:
तुम्हारे दाँत अनार के दानों जैसे सफ़ेद, सम और चमकीले हैं।
यह पवित्र मुस्कान और सौम्यता का प्रतीक है।
7.
“थारा ओठ हिगुव्ठ की रेख रनुबाई”
भावार्थ:
तुम्हारे होंठ हिंगुल (लाल खनिज) की रेखा जैसे लाल और स्पष्ट हैं।
यह सौंदर्य, वाणी की मधुरता और आकर्षण को दर्शाता है।
8.
“थारा हाथ चम्पा का छोड़ रनुबाई”
भावार्थ:
तुम्हारे हाथ चंपा के फूल की डाली जैसे कोमल और सुगंधित हैं।
यह उपमा करुणा, सृजन और सौम्य कर्म का संकेत देती है।
9.
“थारा पांय केव्ठ का खंब रनुबाई”
भावार्थ:
तुम्हारे चरण केवठ (केले/कमल-डंठल जैसे पौधे) के खंभे जैसे मजबूत और सुंदर हैं।
यह स्थिरता, मर्यादा और शुभ आगमन का संकेत है।
10.
“थारो काई काई रूप बखाणू रनुबाई”
भावार्थ:
गीत के अंत में पुनः यही भाव आता है कि रनुबाई का सौंदर्य अनंत है—उसका वर्णन कभी पूरा नहीं हो सकता।
यह पुनरावृत्ति भक्ति, श्रद्धा और विस्मय को और गहरा करती है।
सांस्कृतिक निष्कर्ष
यह गीत केवल सौंदर्य-वर्णन नहीं है, बल्कि
निमाड़ी लोक-संस्कृति,
गंगौर पर्व की आस्था,
नारी के दैवी रूप,
और प्रकृति से जुड़े उपमानों का सुंदर संगम है।
श्री गितेश कुमार भार्गव द्वारा रचित भावार्थ इस गीत को आधुनिक समय में भी प्रासंगिक बनाता है, जबकि इसकी आत्मा पूरी तरह परंपरागत निमाड़ी गंगौर लोकधारा में रची-बसी हुई है।



