⭐ सिंगाजी महाराज की जन्म गाथा — कलयुग में धर्म की पुनर्स्थापना की दिव्य कथा
– लेखक – श्री राजेश भाई रेवलिया –
– संपादक -गीतेश कुमार भार्गव –

सिंगाजी महाराज निमाड़ क्षेत्र के अद्भुत सिद्ध संत माने जाते हैं। उनकी जन्म गाथा केवल लोककथा नहीं, बल्कि धर्म, त्याग और दिव्य संकल्प का अनोखा प्रतीक है। यह कथा कलयुग की शुरुआत के वह क्षण दर्शाती है जब धरती पर बढ़ते पापों को मिटाने के लिए देवताओं में एक विशेष निर्णय लिया गया।
सिंगाजी महाराज की जन्म गाथा — श्रृंगी ऋषि का कलयुग में दिव्य अवतार
🌼 कलयुग की शुरुआत और धरती की पीड़ा
कलयुग के प्रारंभिक समय में मध्य भारत का वह क्षेत्र, जिसे आज निमाड़ कहा जाता है, पाप और अधर्म से ग्रसित हो चुका था।
मध्य प्रदेश के इस क्षेत्र में कोई महान संत या महात्मा जन्म नहीं ले रहा था।
धरती पापों के बोझ से कराह रही थी और देव लोक में भी इसकी चिंता गूंजने लगी थी।
देवताओं की इस व्यथा को देखकर स्वर्ग के अधिपति देवराज इंद्र ने धर्म की पुनर्स्थापना हेतु एक विशाल सभा का आयोजन किया। इस सभा में सभी देवता, ऋषि, महात्मा और ज्ञानी आमंत्रित किए गए।
🌺 देव सभा में धर्म की पुनर्स्थापना का प्रस्ताव
देवराज इंद्र ने सभा में प्रस्ताव रखा—
“धरती का पाप नाश करने तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए किसी महापुरुष का जन्म आवश्यक है।”
लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि
सभा में उपस्थित सभी देवता व ऋषि यह कहकर इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने लगे:
→ “धरती पर पाप इतना बढ़ चुका है कि हम वहां अवतार नहीं ले सकते।”
देव लोक में चिंता की आग फैल गई। तभी भगवान विष्णु ने महर्षि श्रृंगी ऋषि को संबोधित करते हुए कहा—
“हे ऋषिवर, राजा परीक्षित को आपने जो श्राप दिया था, अब उसके पश्चाताप का समय आ गया है।
कलयुग में आपको धरती पर अवतार लेकर धर्म की पुनर्स्थापना करनी होगी।”
🌿 श्रृंगी ऋषि का संकल्प और उनकी दो शर्तें
श्रीहरि का आदेश सुनकर महर्षि श्रृंगी ऋषि ने अवतार लेने की सहमति दी, लेकिन दो महत्वपूर्ण शर्तों के साथ—
श्रृंगी ऋषि की शर्तें
काम, क्रोध, लोभ और मोह उनसे सदा दूर रहें।
उनके वचन और इच्छाएँ सदा सत्य सिद्ध हों।
सभा में उपस्थित सभी देवताओं ने इन दिव्य शर्तों को स्वीकार कर लिया।
🌾 ब्राह्मण कुल में जन्म से इनकार
देवराज इंद्र ने उनसे ब्राह्मण कुल में जन्म लेने का आग्रह किया, लेकिन श्रृंगी ऋषि ने कहा—
“मैं उसी ब्राह्मण कुल में पुनर्जन्म नहीं लूंगा जहाँ मेरे श्राप के कारण राजा परीक्षित को मृत्यु को प्राप्त होना पड़ा।”
इसलिए उन्होंने कहा कि वे गवली (गोपाल) वंश में जन्म लेना चाहते हैं।
देवता आश्चर्यचकित हो उठे, क्योंकि गवली समुदाय मवेशियों की देखभाल करता था और सामान्यतः गांव की साधारण जीवनशैली में रहता था।
लेकिन श्रृंगी ऋषि दृढ़ रहे—
→ “मैं गवली वंश में ही जन्म लूंगा। यही मेरा निर्णय है।”
देवताओं ने अनमने मन से सहमति दी।
श्रृंगी ऋषि ने अपने अवतार का समय, दिन और शुभ घड़ी स्वयं निर्धारित की।
🌞 सिंगाजी महाराज का दिव्य अवतार
निमाड़ क्षेत्र के बड़वानी जिले में स्थित डेभ नदी के किनारे खजूरी गांव में गवली दंपत्ति भीमा जी और गऊर बाई रहते थे।
📅 अवतार का शुभ समय
संवत: 1576
माह: बैसाख शुद्ध नवमी
दिन: बुधवार
समय: सूर्योदय
इस शुभ मुहूर्त में जब गऊर माता गोबर के उपले (कंडे) थाप रही थीं, तभी तेज प्रकाश के साथ श्रृंगी ऋषि ने सिंगाजी महाराज के रूप में जन्म लिया।
✨ धरती पर प्रकाश और अद्भुत चमत्कार
लोककथाओं के अनुसार—
सिंगाजी के जन्म लेते ही पूरा क्षेत्र दिव्य प्रकाश से जगमगा उठा।
गांव की महिलाएँ अचंभित होकर दौड़ीं और देखा कि गऊर माता बेहोश थीं।
उनके पास एक दिव्य तेज वाला नन्हा बालक रो रहा था।
यह समाचार पूरे गांव और आसपास के क्षेत्रों में बिजली की तरह फैल गया।
गांव में उत्सव जैसा माहौल बन गया और सभी ने समझ लिया—
सिंगाजी की जलवाई पूजन
गांव की महिलाएं ग्ऊरबाई और नवजात शिशु को आपने साथ लेकर घर आ गई,, और आनंद मंगलाचार वधावा गान के साथ, जैसा की निमाड़ की प्राचीन संस्कृति है जन्म के समय पर गण बजाना किया जाता है जच्चा-बच्चा को समाज के रिति-रिवाज से नहलाना धुलवाने कार्य चलता रहता है,जब बच्चा दस दिन का हों जाता है,गांव की महिलाएं रिश्तेदार,, ग्ऊरबाई को पीले वस्त्र धारण कर नदी डेब पर जलवाई,,(सुरज पुजा) के लिए जच्चाऐ गाती बजाती,, लें जाती हैं|
जब ग्ऊरबाई नदी घाट पर जलवाई (सुरज पुजा)कर के वापस ग्ऊरबाई आपनी सखियों के साथ घर आती है,,,, महिलाएं भी आंनद बधावा गाती है,, और ग्ऊरबाई को जच्चा-बच्चा की बधाई देती है,,,शक्कर सांझी बतासे बाट कर खुशियां मनाती है,,,,,और इस प्रकार से श्रृंगी ऋषि ने एक दिव्य संत के रूप में भीमा जी और गऊर माता यहां जन्म लिया|
→ दिव्य आत्मा ने अवतार लिया है।
इस प्रकार श्रृंगी ऋषि ने गवली वंश में जन्म लेकर सिंगाजी महाराज के रूप में धरती पर धर्म की पुनर्स्थापना का संकल्प पूरा किया।
मध्यप्रदेश निमाड़ संत कथा

