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विकास की कीमत – कटते जंगलों की पुकार-Gitesh kumar Bhargava

विकास की कीमत – कटते जंगलों की पुकार | पर्यावरण और जंगल संरक्षण-Gitesh kumar Bhargava

जंगल कटते हैं तो केवल पेड़ नहीं गिरते, भविष्य की जड़ें भी हिल जाती हैं

विकास की कीमत – कटते जंगलों की पुकार
जंगल कटते हैं तो प्रकृति रोती है

विकास की कीमत – कटते जंगलों की पुकार

🌿  जंगल – भारत की आत्मा

भारत की धरती सदियों से हरियाली, जीवन और संस्कृति का संगम रही है।
अरावली की पहाड़ियाँ, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के घने जंगल केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं हैं — ये इस देश की आत्मा हैं

यहाँ की मिट्टी में आदिवासी संस्कृतियों की सुगंध है, जो जंगल से अपना अस्तित्व, अन्न और पहचान पाती हैं। जंगल उनके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं।

✦ जब पेड़ बोलते हैं…

भारत की धरती केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं,
यह हरियाली, जीवन और संस्कृति का जीवित दस्तावेज़ है।
अरावली की पहाड़ियाँ हों या मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगल —
ये केवल पेड़-पौधे नहीं, बल्कि इस देश की आत्मा हैं।

इन जंगलों की गोद में आदिवासी संस्कृतियाँ पलीं,
जिनकी पहचान, भोजन और जीवन —
सब कुछ जंगल से जुड़ा रहा।


🏭 विकास के नाम पर विनाश

आज “वैश्वीकरण” और “विकास” के नाम पर इन वनों की जड़ें उखाड़ी जा रही हैं।
बड़े उद्योगों के लिए सड़कें, खदानें और कारखाने बनाए जा रहे हैं।

पेड़ों को काटकर, पहाड़ों को तोड़कर और नदियों की दिशा मोड़कर एक कृत्रिम विकास मॉडल गढ़ा जा रहा है —
जिसमें लाभ केवल कुछ पूँजीपतियों का है,
और नुकसान पूरे समाज व प्रकृति का।

🔴 सवाल यह नहीं कि विकास हो या नहीं

सवाल यह है — किस कीमत पर?

आज “विकास” और “वैश्वीकरण” के नाम पर
जंगलों की जड़ें उखाड़ी जा रही हैं।

  • सड़कें बन रही हैं

  • खदानें खोदी जा रही हैं

  • उद्योगों का विस्तार हो रहा है

लेकिन इसके बदले:

  • पेड़ गिर रहे हैं

  • पहाड़ टूट रहे हैं

  • नदियों की दिशा बदली जा रही है

यह विकास कुछ गिने-चुने लोगों के लिए लाभ है,
और समाज व प्रकृति के लिए दीर्घकालीन नुकसान


🌳 जंगलों की व्यथा

अरावली की हरियाली, जो कभी राजस्थान की प्राणवायु थी, अब धीरे-धीरे पत्थर और धूल में बदल रही है।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगल — जो आदिवासियों का घर हैं — वहाँ हो रही कटाई से:

  • पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है

  • वर्षा कम हो रही है

  • भूमिगत जलस्तर गिर रहा है

  • मिट्टी बंजर होती जा रही है

पेड़ केवल लकड़ी नहीं देते —
वे हवा शुद्ध करते हैं,
मिट्टी को थामे रखते हैं,
और असंख्य जीवों का घर होते हैं।

जब इन्हें “विकास” की बलि चढ़ाया जाता है, तो नतीजा होता है —
सूखा, बाढ़, प्रदूषण और जलवायु संकट।

🌳 जंगलों का दर्द

अरावली, जो कभी राजस्थान की साँस थी,
आज पत्थर और धूल में बदलती जा रही है।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगल,
जो आदिवासियों का घर हैं —
वहाँ की कटाई ने:

  • वर्षा को कम किया

  • भूजल को नीचे गिराया

  • ज़मीन को बंजर बनाया

पेड़ केवल लकड़ी नहीं देते,
वे हवा, पानी और जीवन देते हैं।

जब वे कटते हैं,
तो प्रकृति अपना संतुलन खो देती है —
और परिणाम होते हैं:
सूखा, बाढ़, प्रदूषण।


🌱 आदिवासी और प्रकृति का रिश्ता

आदिवासी समुदाय जंगलों के रक्षक हैं, उपभोक्ता नहीं।
वे पेड़ को देवता, जल को जीवन और धरती को माता मानते हैं।

लेकिन जब उनकी भूमि बड़ी कंपनियों को सौंप दी जाती है:

  • उनका घर उजड़ जाता है

  • आजीविका छिन जाती है

  • वे विस्थापन की पीड़ा झेलने को मजबूर हो जाते हैं

यह सबसे बड़ी विडंबना है कि
जो लोग सदियों से पर्यावरण की रक्षा करते आए,
आज वही सबसे अधिक पीड़ित हैं।


🌱 आदिवासी : जंगलों के असली रक्षक

आदिवासी जंगल के उपभोक्ता नहीं,
वे उसके संरक्षक हैं।

उनके लिए:

  • पेड़ देवता है

  • जल जीवन है

  • धरती माँ है

लेकिन जब उनकी भूमि कंपनियों को सौंप दी जाती है,
तो केवल जंगल नहीं कटते —
उनका पूरा जीवन उजड़ जाता है।

जो लोग सदियों से पर्यावरण बचाते आए,
आज वही सबसे अधिक विस्थापित हैं।


🌍 विकास का नया अर्थ

सच्चा विकास वह नहीं जो हरियाली को समाप्त कर दे,
बल्कि वह है जो मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखे।

जब तक हम पेड़ों की पुकार नहीं सुनेंगे,
धरती हमें चेतावनी देती रहेगी —

  • बढ़ते तापमान के रूप में

  • सूखती नदियों के रूप में

  • और बीमार होती हवा के रूप में

जंगलों को बचाना केवल पर्यावरण की जरूरत नहीं,
यह हमारे भविष्य की सुरक्षा है।

अगर अब भी दिशा नहीं बदली,
तो आने वाली पीढ़ियाँ जंगलों को केवल किताबों में देखेंगी।


✨ अगर अभी नहीं संभले…

तो आने वाली पीढ़ियाँ
जंगलों को केवल किताबों, तस्वीरों
और कहानियों में जानेंगी।

जंगल बचाना
कोई विकल्प नहीं —
यह भविष्य की ज़रूरत है।


✒️  निष्कर्ष – Gitesh kumar Bhargava

पेड़ बोले – मत काट मुझे, मैं ही तेरी साँस में बसा हूँ,
तेरे बच्चों की हर धड़कन में, मेरा ही हर रंग रँगा हूँ।
तू खो देगा मुझको अगर, तो खुद को कहाँ पा सकेगा?
धरती अब भी माफ़ करेगी, अगर तू आज संभल सकेगा।

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