निमाड़ी कलाकार

शीतला सप्तमी की पूजा कैसे करते है ?

शीतला सप्तमी की पूजा कैसे करते है ?

शीतला सप्तमी की पूजा कैसे करते है ?
शीतला सप्तमी की पूजा कैसे करते है ?

शीतला सप्तमी 2026: महत्व, पूजा विधि, व्रत कथा, नियम और स्वास्थ्य से जुड़ा वैज्ञानिक पक्ष

भारत में कई ऐसे पर्व हैं जो केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं होते, बल्कि समाज के स्वास्थ्य, स्वच्छता और लोकजीवन से भी गहराई से जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व है शीतला सप्तमी। यह व्रत विशेष रूप से उत्तर भारत, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश में बड़ी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है।

इस दिन भक्तगण शीतला माता की पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, बच्चों के स्वास्थ्य और रोगों से रक्षा की कामना करते हैं। लोक मान्यता के अनुसार शीतला माता को रोगों से मुक्ति देने वाली देवी माना जाता है, विशेष रूप से चेचक और त्वचा संबंधी रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में उनकी पूजा की जाती है।

यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में स्वच्छता, संयम और संतुलित जीवनशैली कितनी महत्वपूर्ण है। इसलिए शीतला सप्तमी केवल एक धार्मिक व्रत नहीं बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छता का सांस्कृतिक संदेश देने वाला पर्व भी है।


शीतला सप्तमी क्या है

शीतला सप्तमी हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत और पर्व है जो माता शीतला को समर्पित है। इस दिन महिलाएँ और परिवार के सदस्य माता की पूजा करके अपने परिवार के स्वास्थ्य और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

इस पर्व की सबसे खास बात यह है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और एक दिन पहले बनाया गया भोजन ही माता को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

भारत के कई हिस्सों में इसे बसोड़ा या बसोड़ा पर्व भी कहा जाता है।


शीतला माता कौन हैं ?

शीतला माता कौन हैं ?
शीतला माता कौन हैं ?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता देवी दुर्गा का ही एक रूप मानी जाती हैं। उनका स्वरूप रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।

माता शीतला की प्रतिमा या चित्र में सामान्यतः कुछ विशेष प्रतीक दिखाई देते हैं:

  • हाथ में झाड़ू

  • हाथ में कलश

  • नीम के पत्ते

नीम के पत्तों को आयुर्वेद में औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। यही कारण है कि शीतला माता की पूजा में नीम के पत्तों का विशेष महत्व होता है।


शीतला सप्तमी कब मनाई जाती है

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शीतला माता का यह पर्व अलग-अलग तिथियों पर मनाया जाता है। अधिकतर स्थानों पर यह होली के बाद आने वाली चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी को मनाया जाता है।

कुछ क्षेत्रों में यह पर्व शीतला अष्टमी के रूप में भी मनाया जाता है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में यह पर्व होली के बाद आने वाले सप्ताह में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है।


शीतला सप्तमी का धार्मिक महत्व

शीतला सप्तमी का मुख्य उद्देश्य माता शीतला की पूजा करके रोगों से रक्षा की प्रार्थना करना है।

पुराने समय में जब चिकित्सा सुविधाएँ सीमित थीं, तब लोग मानते थे कि देवी की कृपा से महामारी और बीमारियों से बचाव हो सकता है। इसलिए इस दिन विशेष रूप से माता शीतला की पूजा की जाती है।

यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में स्वास्थ्य, स्वच्छता और संयम का विशेष महत्व है।


शीतला सप्तमी की तैयारी

इस व्रत की तैयारी एक दिन पहले से ही शुरू हो जाती है। इस दिन घर में विभिन्न प्रकार के भोजन बनाए जाते हैं ताकि अगले दिन उन्हें माता को भोग लगाया जा सके।

एक दिन पहले बनने वाले भोजन

  • मीठे चावल

  • पूरी

  • हलवा

  • दही

  • गुड़

  • कढ़ी

  • चने या सब्जी

इन सभी व्यंजनों को अगले दिन बासी भोग के रूप में माता को अर्पित किया जाता है।


शीतला सप्तमी की पूजा विधि

शीतला सप्तमी की पूजा विधि
शीतला सप्तमी की पूजा विधि

शीतला सप्तमी के दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और साफ-सुथरे वस्त्र धारण करते हैं।

इसके बाद घर या मंदिर में माता शीतला की पूजा की जाती है।

पूजा की प्रक्रिया

  1. पूजा स्थान को साफ करें और माता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।

  2. माता को जल अर्पित करें।

  3. रोली, हल्दी और अक्षत चढ़ाएं।

  4. मेहंदी और लच्छा अर्पित करें।

  5. नीम के पत्ते चढ़ाएं।

  6. बासी भोजन का भोग लगाएं।

  7. शीतला माता की कथा सुनें।

  8. अंत में आरती करें।

यदि घर के आसपास मंदिर न हो तो यह पूजा घर में भी आसानी से की जा सकती है।


शीतला सप्तमी के नियम

इस व्रत में कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाता है।

चूल्हा नहीं जलाया जाता

इस दिन घर में खाना नहीं बनाया जाता।

गरम भोजन नहीं खाया जाता

एक दिन पहले बनाया गया भोजन ही खाया जाता है।

दीपक या अगरबत्ती नहीं जलाते

माता को शीतलता प्रिय मानी जाती है, इसलिए पूजा में अग्नि का प्रयोग नहीं किया जाता।

परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण

पूजा के बाद पूरा परिवार मिलकर प्रसाद ग्रहण करता है।


शीतला सप्तमी का मंत्र

पूजा के समय इस मंत्र का जाप किया जाता है:

ऊँ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः

इस मंत्र के जाप से माता शीतला की कृपा प्राप्त होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।


शीतला माता की व्रत कथा

प्राचीन समय में एक गांव में दो महिलाएँ रहती थीं। उनमें से एक महिला माता शीतला की पूजा और व्रत बड़े श्रद्धा से करती थी। वह हर वर्ष शीतला सप्तमी के दिन बासी भोजन का भोग लगाती और पूरे नियम से पूजा करती थी।

दूसरी महिला इन परंपराओं को महत्व नहीं देती थी और पूजा के दिन भी गरम भोजन बनाती थी।

कुछ समय बाद गांव में एक भयंकर बीमारी फैल गई। गांव के कई लोग बीमार पड़ गए, लेकिन जो महिला माता शीतला का व्रत करती थी उसके परिवार को कोई बीमारी नहीं हुई।

तब गांव वालों को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने भी माता शीतला की पूजा शुरू की। धीरे-धीरे गांव में बीमारी समाप्त हो गई।

यह कथा हमें सिखाती है कि श्रद्धा, नियम और स्वच्छता जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं।


शीतला सप्तमी और स्वास्थ्य का वैज्ञानिक पक्ष

शीतला सप्तमी के पीछे केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ी वैज्ञानिक सोच भी छिपी हुई है।

नीम का महत्व

नीम में एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुण होते हैं।

चूल्हा न जलाना

एक दिन चूल्हा न जलाने से घर में धुआँ और प्रदूषण कम होता है।

हल्का भोजन

बासी भोजन ठंडा और हल्का होता है, जिससे शरीर को आराम मिलता है।

इस प्रकार यह पर्व लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का माध्यम भी रहा है।


भारत के विभिन्न राज्यों में शीतला सप्तमी

भारत के कई राज्यों में यह पर्व अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है।

राजस्थान

यहाँ इसे बसोड़ा कहा जाता है और शीतला माता के मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।

मध्यप्रदेश

गांवों में महिलाएँ सामूहिक रूप से पूजा करती हैं और पारंपरिक गीत गाती हैं।

गुजरात

यहाँ शीतला माता के मंदिरों में विशेष पूजा और मेले आयोजित होते हैं।

उत्तर प्रदेश

लोग घरों में पूजा करके बासी भोजन का भोग लगाते हैं।


शीतला माता के प्रसिद्ध मंदिर

भारत में कई प्रसिद्ध शीतला माता मंदिर हैं जहाँ श्रद्धालु बड़ी संख्या में दर्शन करने आते हैं।

कुछ प्रमुख मंदिर हैं:

  • गुरुग्राम का शीतला माता मंदिर

  • राजस्थान के कई प्राचीन शीतला माता मंदिर

  • मध्यप्रदेश के ग्राम देवी मंदिर

इन मंदिरों में शीतला सप्तमी के दिन विशेष पूजा और भंडारे का आयोजन किया जाता है।


शीतला सप्तमी और लोक संस्कृति

ग्रामीण भारत में यह पर्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है। यह लोक संस्कृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इस दिन महिलाएँ:

  • पारंपरिक गीत गाती हैं

  • सामूहिक पूजा करती हैं

  • प्रसाद बांटती हैं

इससे समाज में एकता और भाईचारा बढ़ता है।


आधुनिक समय में शीतला सप्तमी

आज के आधुनिक युग में चिकित्सा सुविधाएँ बहुत विकसित हो चुकी हैं, लेकिन फिर भी लोग शीतला सप्तमी को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाते हैं।

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि:

  • स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है

  • स्वच्छता आवश्यक है

  • परंपराएँ समाज को जोड़ती हैं


निष्कर्ष

शीतला सप्तमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और आस्था का सुंदर संगम है। इस दिन माता शीतला की पूजा करके लोग अपने परिवार की सुख-समृद्धि, संतान के स्वास्थ्य और रोगों से रक्षा की कामना करते हैं।

यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि जीवन में परंपराएँ केवल आस्था नहीं बल्कि अनुभव और ज्ञान का संग्रह होती हैं। इसलिए आज भी देश के कई हिस्सों में लोग श्रद्धा और विश्वास के साथ शीतला माता की पूजा करते हैं और उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं।

Scroll to Top